۞ وَقَيَّضۡنَا
لَهُمۡ
قُرَنَآءَ
فَزَيَّنُواْ
لَهُم
مَّا
بَيۡنَ
أَيۡدِيهِمۡ
وَمَا
خَلۡفَهُمۡ
وَحَقَّ
عَلَيۡهِمُ
ٱلۡقَوۡلُ
فِيٓ
أُمَمٖ
قَدۡ
خَلَتۡ
مِن
قَبۡلِهِم
مِّنَ
ٱلۡجِنِّ
وَٱلۡإِنسِۖ
إِنَّهُمۡ
كَانُواْ
خَٰسِرِينَ
٢٥
और हमने उनके लिए कुछ साथी नियुक्त कर दिए, तो उन्होंने उनके अगले और पिछले कामों को उनके लिए शोभित बनाकर पेश किया। तथा उनपर भी जिन्नों और इनसानों के उन समूहों के साथ, जो उनसे पहले गुज़र चुके थे, अल्लाह (की यातना) का वादा सिद्ध हो गया। निश्चय ही वे घाटा उठाने वाले थे।
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Ibn Kathir (Abridged)