وَقَالَ
ٱلشَّيۡطَٰنُ
لَمَّا
قُضِيَ
ٱلۡأَمۡرُ
إِنَّ
ٱللَّهَ
وَعَدَكُمۡ
وَعۡدَ
ٱلۡحَقِّ
وَوَعَدتُّكُمۡ
فَأَخۡلَفۡتُكُمۡۖ
وَمَا
كَانَ
لِيَ
عَلَيۡكُم
مِّن
سُلۡطَٰنٍ
إِلَّآ
أَن
دَعَوۡتُكُمۡ
فَٱسۡتَجَبۡتُمۡ
لِيۖ
فَلَا
تَلُومُونِي
وَلُومُوٓاْ
أَنفُسَكُمۖ
مَّآ
أَنَا۠
بِمُصۡرِخِكُمۡ
وَمَآ
أَنتُم
بِمُصۡرِخِيَّ
إِنِّي
كَفَرۡتُ
بِمَآ
أَشۡرَكۡتُمُونِ
مِن
قَبۡلُۗ
إِنَّ
ٱلظَّٰلِمِينَ
لَهُمۡ
عَذَابٌ
أَلِيمٞ
٢٢
और जब निर्णय कर दिया1 जाएगा, तो शैतान कहेगा : निःसंदेह अल्लाह ने तुमसे सच्चा वादा किया था। और मैंने (भी) तुमसे वादा किया था, तो मैंने तुमसे वादाखिलाफ़ी की। और मेरा तुमपर कोई आधिपत्य नहीं था, सिवाय इसके कि मैंने तुम्हें (अपनी ओर) बुलाया, तो तुमने मेरी बात मान ली। अब मेरी निंदा न करो, बल्कि स्वयं अपनी निंदा करो। न मैं तुम्हारी फ़रयाद सुन सकता हूँ और न तुम मेरी फ़रयाद सुन सकते हो। निःसंदेह मैं उसका इनकार करता हूँ, जो तुमने इससे पहले2 मुझे साझी बनाया। निश्चय अत्याचारियों के लिए दर्दनाक यातना है।